8 सितंबर 2012 - 19:30

दुनिया के विभिन्न देशों में वहाबियों के अपराधों में वृद्धि और इन अपराधों का सिलसिला इंडोनेशिया और लीबिया तक पहुंचने पर, विश्व अहलेबैत (अ) परिषद ने एक महत्वपूर्ण बयान जारी किया है।........

अहलेबैत (अ) समाचार एजेंसी अबना की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के विभिन्न देशों में वहाबियों के अपराधों में वृद्धि और इन अपराधों का सिलसिला इंडोनेशिया और लीबिया तक पहुंचने पर, विश्व अहलेबैत (अ) परिषद ने एक महत्वपूर्ण बयान जारी किया है।इस बयान में ऐतिहासिक प्रमाण के आधार पर, साम्राज्यवादी शक्तियों के साथ वहाबियत के सहयोग और उनके समर्थन को साबित किया गया है और कहा गया है कि "जब भी मुसलमानों की रगों में ताज़ा खून जारी होने लगता है और इस्लाम दुश्मनों को हर और से निराशा और घुटन का सामना करना पड़ता है तो वहाबी आतंकवादी अपनी विध्वंसक गतिविधियों को त्रीवता से अंजाम देने लगते हैं और इस्लाम व मुसलमानों की महिमा और महानता के रास्ते में रूकावट डालते हैं।इस बयान में इस्लामी जागरूकता की बहार के सामने में वहाबियों के षड़यंत्र की तरफ़ इशारा किया गया है और कहा गया है कि वहाबी वर्तमान स्थिति से अवैध लाभ उठाकर शहीदों के खून को नष्ट करने में लग जाते हैं और अव्यवस्था और अस्थिरता की स्थिति में अपनी निंदनीय साजिशों को क्रियात्मक बनाने में लग जाते हैं।بسم الله الرحمن الرحیمقال الله تعالی في کتابه الکریم: الفتنَةُ أَشَدّ مِنَ القَتْل. (سوره مبارکه بقره ـ آیه 191)और उपद्रव तथा अशांति फैलाना तो हत्या से अधिक सख्त (अपराध) है।पथ भ्रष्ट वहाबियों की इस्लाम विरोधी कार्यवाहियाँ जिनमें पिछले महीनों में तीव्रता आई है और हाल के दिनों में अपने चरम पर पहुंच गई हैं और पाकिस्तान में शिया नरसंहार को जारी रखते हुए उनके अपराधों और दरिंदगी का सिलसिला लीबिया और इंडोनेशिया तक पहुंच चुका है और परिणाम स्वरूप लीबिया में पवित्र इस्लामी स्थलों को खराब किया जा रहा है।इसी सिलसिले में हाल ही में हमने देखा कि "पाकिस्तान में शियों की बसों को दिन दहाड़े रोका गया और कई शिया यात्रियों को शहीद किया गया", "इंडोनेशिया में शिया लोगों की हत्या की गई, उनके घरों को आग के हवाले कर दिया गया और उन्हें बेघर कर दिया गया ", बहरैन में शिया मस्जिदों को आग लगा दी गई, कुरआने मजीद जला दिए गए और विद्वानों और सहाबा के मक़बरों और मज़ारों को ध्वस्त किया गया", "सीरिया की राजधानी दमिश्क में उस मज़ार को शहीद किया गया जो रसूले इस्लाम (स.) के नाती हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से संबंधित था "," लीबिया के शहर "ज़िलीतन" मैं रसूलुल्लाह (स.) के बड़े नवासे इमाम हसन अलैहिस्सलाम के पोते की कब्र को ध्वस्त किया गया", "लीबिया में दर्जनों हसनी सय्यदों और आले मुहम्मद (स.) के शियों को शहीद किया गया", और ऐसे अपराध किए गए जो कुफ़्फ़ार और मुशरेकीन, यहूदी व ईसाई के हाथों नहीं बल्कि ऐसे दरिंदों और वहशियों के हाथों अंजाम पाए जो अपने मुसलमान होने का ढ़िढ़ोंरा पीट रहे हैं और यह सिलसिला उन्हीं के हाथों पूरे इस्लामी जगत में बदस्तूर जारी है।इन शोकजनक घटनाओं में बढ़ोतरी को देखते हुए विश्व अहलेबैत (अ) परिषद, दुनिया के करोड़ों मुसलमानों के यहां अंतरराष्ट्रीय विचारक, शैक्षिक और सांस्कृतिक स्रोत के रूप में ज़रूरी समझता है कि दुनिया वालों का ध्यान निम्नलिखित प्वाइंट्स पर केंद्रित कराए।1. दुनिया भर के मुसलमानों के लिए महत्वपूर्ण समस्या यह है कि जब भी मुसलमानों के रगों में ताज़ा खून जारी होने लगता है और इस्लामी दुश्मनों को हर ओर से निराशा और घुटन का सामना करना पड़ता है तो वहाबी आतंकवादी अपनी विध्वंसक गतिविधियों को त्रीवता से अंजाम देने लगते हैं और इस्लाम व मुसलमानों की महिमा और महानता के रास्ते में रूकावट डालते हैं।सम्भव है कि जब अफगानिस्तान में मुजाहेदीन ने सेनाओं को हराया, "तालिबान" नामक समूह ज़ाहिर हुआ और इस गिरोह ने जीत और सफलता की मिठास को मज़लूम अफगानियों के लिए कड़वाहट में बदल दिया?क्या यह एक आकस्मिक घटना है कि सद्दाम के पतन के साथ ही वहाबी आतंकवादियों ने मज़लूम इराक को धमाकों और अशांति के केंद्र में परिवर्तित कर दिया?क्या यह केवल एक संयोग है कि तानाशाहों और साम्राजियों के खिलाफ मिस्र और लीबिया की जनता की सफलता के बाद कट्टरपंथी वहाबियों ने मैदान में आकर जनता के सम्मानित पवित्र स्थानों पर हमले करके सांप्रदायिक हिंसा के लिए मार्ग प्रशस्त किया?क्या यह सोच साधारण नहीं है कि हम समझें कि कुफ़्र के मोर्चे से प्रतिरोध मोर्चे पर बढ़ता हुआ दबाव जो वहाबियों की बेहद वित्तीय सहायता और मीडिया के समर्थन से डाला जा रहा है लेबनान और फ़िलिस्तीन में मुसलमानों की उपलब्धियों और यहूदी राज्य की खुली हार का परिणाम नहीं है?!कुफ़्र व साम्राज्यवाद और यहूदी व ईसाईयों के साथ वहाबियों के समझौते और गठबंधन, उन लोगों के लिए सबसे अच्छा जवाब है जो अभी तक यह समझते हैं कि वहाबित एक नकली धर्म नहीं है और पश्चिम की गोद में परवान नहीं चढ़ा है!2. अफ़सोस है कि अमेरिका और जायोनियों के इस टोले की कार्यवाहियाँ केवल शारीरिक यातनाओं, हत्याओं और आतंकवादी हमलों तक सीमित नहीं है बल्कि अबू जहेल और अबू लहेब के यह उत्तराधिकारी जिन्हें कुछ लोग ख़ारजियों का वारिस भी कहते हैं मुस्लिम राष्ट्र की संस्कृति और सभ्यता को भी निशाना बनाए रहे हैं।मुसलमानों की सांस्कृतिक स्मृतियों और मुस्लिम समुदाय के इतिहासिक स्थलों पर हाथ डालना और उन्हें नीस्तनाबूद करने के वहाबियों के विचार ऑले सऊद के इतिहास के इतना पुराना है। "मदीना मुनव्वरा के ऐतिहासिक मज़ारों जन्नतुल बक़ीअ, अहलेबैत (अ.) और रसूले इस्लाम (स.) के सहाबा और इस्लाम के आरम्भिक युग की समाधियों और मकबरों का विध्वंस "," पवित्र करबला में रसूले इस्लाम (स.) के नाती इमाम हुसैन (अ) के हरम को दो बार ध्वस्त करना," पूरे हेजाज़ में इस्लामी संस्कृति की सभी निशानियों का धीरे धीरे मिटाया जाना, "इराक़ के शहर सामर्रा में दो इमामों (अ) के हरमों का विध्वंस", "मिस्री जनता के लिए सम्मानित बुजुर्गों की कब्रों का विध्वंस और आग लगाना", "मिस्र में रासुलहुसेन (अ) नामक स्थान को ध्वस्त करने की कोशिश "," सीरिया के शहर हलब में मोहसिन बिन हसन (अ) से संबंधित मज़ार का विध्वंस "और अंत में" लीबिया के शहर ज़िलीतन में रसूले इस्लाम (स.) के नाती हज़रत इमाम हसन मुज्तबा (अ) के पुत्र हज़रत अबदुस्सलाम हसन के मज़ार का विध्वंस ", इन दुखद सांस्कृतिक अपराधों के नमूने हैं।इस बीच दुनिया के बुद्धिजीवी, करोड़ों अरबों डॉलर ख़र्च करके अपने ऐतिहासिक और प्राचीन अवशेष की चाहे वह धार्मिक हों या गैर धार्मिक सुरक्षा का प्रबंध करते हैं और उन निशानियों को जिन्हें उनकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के लक्षण माना जाता है, गर्व की निगाह से देखते हैं।3. एक महत्वपूर्ण समस्या यह है कि वहाबियों ने जागे हुए लोगों की स्वतंत्रता और स्वाधीनता की प्राप्ति के लिए किए जाने वाले आंदोलनों और शहीदों के खून को अपहरण करने की कोशिश कर कहे हैं। सब जानते हैं यह इब्ने तैमिया के अनुयायियों और वहाबियों ने कभी भी इस्लामी जागरूकता की बहार में कोई सकारात्मक भूमिका नहीं निभाई है, बल्कि अपने बनाए हुए नियम जैसे क़ब्ज़ा कर लेने वाला हक़ पर है" और शासक पाप और भ्रष्टाचार के कारण सत्ता से अपदस्थ नहीं हुआ करता", के तहत मिस्र के "हसनी मुबारक" लीबिया के "कज़्ज़ाफ़ी", बहरैन के "ऑले खलीफा" और सऊदी अरब पर थ